राम कथा के छठवें दिन सीतापुर से पधारे आचार्य आशुतोष मिश्र ने बहुत ही सुमधुर स्वर से भरत राम प्रेम पर विचार व्यक्त किए। लोग पूरी तरह से शांति व्यवस्था का पालन करते हुए कथा का रसपान किया।
जब ननिहाल से भरत जी अयोध्या वापस आए तो उन्हें रास्ते में अपशगुन हुए। जब महल में आए पूरी तरह से शोकाकुल का माहौल था।
जब कैकई माँ से पूछा तो पूरा हाल बताया।। भरत जी बहुत दुखी हुए। निश्चय किया कि सभी लोग वन चलकर श्री राम को वापस लाएंगे। लेकिन श्री राम ने समझा बुझाकर वापस किया। भरत ने चरण पादुका सिंहासन पर रखकर स्वंम सन्यासी के वेश में नंदीगाम में रहकर शासन काल चलाया।
इतिहास के स्वर्णाक्षरों में भरत का नाम होगा। करतल ध्वनि से श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम संकीर्तन कराया। परीक्षित बने वरिष्ठ पत्रकार कुंवर देवेन्द्र सिंह तथा उनकी पत्नी राखी सिंह ने आरती पूजन किया।
प्रमुख रुप से राजपाल सिंह अमित कुमार उर्फ कल्लू भाई अमित कुमार शर्मा आचार्य सुधीर चतुर्वेदी जगपाल सिंह रक्षपाल सिंह उर्फी पप्पू भैया सहित तमाम गांवों से लोग मौजूद रहे।








