आजकल हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एक नया ट्रेंड दिखाई दे रहा है,फिल्में युवा पीढ़ी यानी Gen Z को ध्यान में रखकर बनाने की बात हो रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारे फिल्म मेकर वास्तव में Gen Z को समझ भी रहे हैं? क्योंकि आज “यंग जेनरेशन की फिल्म” बनाने का मतलब सिर्फ कॉलेज, बाइक, प्यार, दोस्ती, पार्टी और कुछ फैशनेबल डायलॉग डाल देना नहीं रह गया है।
आज का युवा बदल चुका है। वह सिर्फ हिंदी या भारतीय सिनेमा नहीं देख रहा। उसके मोबाइल की स्क्रीन पर पूरी दुनिया मौजूद है। वह Korean content देखता है, Japanese anime देखता है, Spanish और American series देखता है और अलग-अलग देशों का सिनेमा देखता है। इंटरनेट ने उसके सामने मनोरंजन के इतने विकल्प खोल दिए हैं कि अब किसी भारतीय फिल्म के लिए उसका ध्यान खींचना पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है।
यहीं शायद भारतीय फिल्म मेकर से सबसे बड़ी चूक हो रही है। हम Gen Z को सिर्फ उसकी उम्र से पहचानने की कोशिश कर रहे हैं। 18 से 25 साल के किरदार रख दिए, कॉलेज दिखा दिया, romance डाल दिया, कुछ trendy music और सोशल मीडिया वाली भाषा इस्तेमाल कर ली और मान लिया कि यह Gen Z की फिल्म है। जबकि Gen Z की असली दुनिया इससे कहीं ज्यादा जटिल है।
आज का युवा करियर को लेकर परेशान है, नौकरी को लेकर परेशान है, प्रतियोगिता से जूझ रहा है और अपने माता-पिता की उम्मीदों तथा अपनी वास्तविक परिस्थितियों के बीच फंसा हुआ है। उसके सामने दुनिया के अवसरों की तस्वीर बहुत बड़ी है, लेकिन उन अवसरों तक पहुंचने के रास्ते उतने आसान नहीं हैं। बड़ी संख्या में युवा बेरोजगारी या कम आमदनी की समस्या से जूझ रहे हैं। ऐसे में फिल्म मेकर को यह सवाल भी पूछना चाहिए कि जिस Gen Z को वह अपनी सबसे बड़ी target audience मान रहा है, क्या उसके पास वास्तव में फिल्म देखने के लिए पैसा भी है?
हम अक्सर मान लेते हैं कि अगर युवा थिएटर नहीं जाएगा तो OTT पर फिल्म देख लेगा। लेकिन यहां भी तस्वीर इतनी आसान नहीं है। हर युवा कई-कई OTT platforms के subscription खरीदने की स्थिति में नहीं है। अगर उसकी आमदनी सीमित है या वह अभी कमाता ही नहीं है, तो हर महीने अलग-अलग subscriptions पर पैसा खर्च करना उसके लिए प्राथमिकता नहीं होगी। और अगर वह कोई OTT platform चुनता भी है, तो जरूरी नहीं कि वह सिर्फ भारतीय फिल्मों के लिए उसे चुने। वह ऐसे platform को प्राथमिकता दे सकता है जहां उसे दुनिया भर का cinema और content देखने को मिले।
यानी भारतीय सिनेमा का मुकाबला अब सिर्फ भारतीय सिनेमा से नहीं है। एक भारतीय युवा के सामने Korean drama, Japanese anime, American series, European cinema और दुनिया के दूसरे हिस्सों का content एक ही मोबाइल स्क्रीन पर उपलब्ध है। उसके पास विकल्पों की कोई कमी नहीं है।
लेकिन इससे भी बड़ी चुनौती है free content। आज मोबाइल पर इतना free entertainment उपलब्ध है कि कोई युवा बिना पैसा खर्च किए घंटों अपना मनोरंजन कर सकता है। YouTube से लेकर Instagram और दूसरे digital platforms तक, creators और short-form content लगातार उसका ध्यान खींच रहे हैं। उसके पास समय बिताने और मनोरंजन करने के लिए हजारों विकल्प हैं।
इसलिए यह समझना जरूरी है कि content की भूख और content के लिए पैसा खर्च करने की क्षमता दो अलग-अलग चीजें हैं। आज की Gen Z content की बहुत बड़ी consumer है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह हर content के लिए paying consumer भी है। वह मोबाइल पर घंटों content देख सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह हर शुक्रवार टिकट खरीदकर थिएटर पहुंचेगी। वह series देखना चाहती है, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि वह चार-पांच अलग-अलग OTT platforms के subscription खरीद लेगी।
यही वह जगह है जहां फिल्म इंडस्ट्री को Gen Z को नए तरीके से समझने की जरूरत है। युवा सिर्फ “young characters” नहीं चाहता। वह अपनी जिंदगी की सच्चाई देखना चाहता है। उसकी anxiety, उसकी ambition, उसकी failure, उसका loneliness, उसके रिश्ते, उसके माता-पिता के साथ उसका तनाव, उसकी बेरोजगारी, social media का दबाव, identity और भविष्य को लेकर उसकी असुरक्षा—ये सब उसकी दुनिया का हिस्सा हैं।
सिर्फ 22 साल के लड़के या लड़की को फिल्म का किरदार बना देने से फिल्म Gen Z की नहीं हो जाती। उस 22 साल के युवा की दुनिया को समझना पड़ेगा। उसकी सोच समझनी पड़ेगी। उसकी आर्थिक स्थिति समझनी पड़ेगी। और सबसे जरूरी बात, यह समझना पड़ेगा कि वह अपनी जेब से पैसा निकालकर आपकी फिल्म क्यों देखेगा।
भारतीय फिल्म इंडस्ट्री आज भी कई बार युवा दर्शक को देखकर उसकी lifestyle copy करने की कोशिश करती दिखाई देती है, लेकिन उसकी psychology और economic reality को समझने की कोशिश कम दिखाई देती है। कपड़े Gen Z के हो जाते हैं, music Gen Z वाला हो जाता है, dialogue Gen Z की भाषा में लिख दिए जाते हैं, लेकिन कहानी वही पुरानी रहती है। फिर सवाल किया जाता है कि युवा फिल्म देखने क्यों नहीं आया।
शायद इसलिए कि उसे पर्दे पर अपना वास्तविक जीवन नहीं, बल्कि फिल्म मेकर की कल्पना में बनाया गया उसका एक caricature दिखाई दिया।
Gen Z के लिए फिल्म बनानी है तो पहले Gen Z को समझना होगा। यह समझना होगा कि आज के युवा के पास content की कमी नहीं है। उसके पास विकल्प बहुत हैं, लेकिन पैसा हमेशा नहीं है। वह free content देख सकता है, दुनिया भर का content देख सकता है और अपने मोबाइल पर कुछ सेकंड में एक फिल्म या series छोड़कर दूसरी चीज देख सकता है।
इसलिए अगली बार जब कोई फिल्म मेकर कहे कि वह Gen Z के लिए फिल्म बना रहा है, तो सिर्फ यह सवाल नहीं होना चाहिए कि Gen Z क्या देखना चाहती है। असली सवाल यह होना चाहिए कि Gen Z किस चीज के लिए अपनी जेब से पैसा खर्च करने को तैयार है।
और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारी फिल्म इतनी खास है कि एक ऐसा युवा, जिसके मोबाइल पर दुनिया भर का free content मौजूद है, वह उसे देखने के लिए पैसे खर्च करके थिएटर तक आए?
शायद आज भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के सामने Gen Z को लेकर यही सबसे बड़ा सवाल है।
~जावेद अहमद











