नई दिल्ली। देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर को लेकर सरकार की ओर से पेश किए जा रहे 7.8 प्रतिशत GDP के आंकड़ों ने आर्थिक बहस को तेज कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार को सरकार की नीतियों की सफलता के तौर पर पेश किए जाने के बीच कुछ अर्थशास्त्रियों ने GDP के आंकड़ों और उनके आकलन की पद्धति पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार शास्त्री ने GDP के आकलन को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल कुछ बड़े उद्योगपतियों की संपत्ति या आय में बढ़ोतरी को आधार बनाकर पूरे देश की आर्थिक स्थिति का आकलन नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक GDP की तस्वीर समझने के लिए अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों, आम लोगों की आय और उनकी क्रय शक्ति को भी व्यापक रूप से देखना जरूरी है।
वहीं, भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी आर्थिक विकास की रफ्तार और उसके जमीनी असर के बीच अंतर को लेकर सवाल उठाया है। उनका सवाल है कि अगर अर्थव्यवस्था इतनी तेज गति से बढ़ रही है, तो उसके अनुरूप निवेश और रोजगार के अवसरों में बढ़ोतरी क्यों दिखाई नहीं दे रही है। उनके इस सवाल ने GDP के आंकड़ों के साथ-साथ विकास की गुणवत्ता पर भी चर्चा को जन्म दिया है।
मोदी सरकार में वित्त सचिव रह चुके सुभाष चंद्र गर्ग ने भी GDP के आंकड़ों को लेकर सवाल उठाए हैं और इन्हें भ्रामक बताए जाने की बात सामने आई है। उनके वक्तव्य ने आर्थिक आंकड़ों की विश्वसनीयता और उन्हें प्रस्तुत किए जाने के तरीके को लेकर चल रही बहस को और गंभीर बना दिया है।
GDP से आगे भी देखनी होगी अर्थव्यवस्था
आर्थिक विशेषज्ञों की आपत्तियों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी देश की आर्थिक स्थिति को केवल GDP की वृद्धि दर से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। महंगाई, बेरोजगारी, निजी निवेश, वास्तविक आय, राजकोषीय घाटा और आम उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति जैसे संकेतक भी अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आलोचकों का तर्क है कि यदि GDP में तेज वृद्धि हो रही है, लेकिन उसी अनुपात में रोजगार, वेतन और निजी निवेश नहीं बढ़ रहे हैं, तो विकास की प्रकृति और उसके लाभों के वितरण पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि, GDP की गणना एक निर्धारित सांख्यिकीय पद्धति के तहत की जाती है और किसी एक व्यक्ति या उद्योगपति की संपत्ति को सीधे देश की GDP नहीं माना जाता। इसलिए GDP के आंकड़ों पर बहस करते समय आंकड़ों की गणना की पद्धति, आधार वर्ष, वास्तविक और नाममात्र वृद्धि तथा अन्य आर्थिक संकेतकों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
फिलहाल 7.8 प्रतिशत की विकास दर को लेकर सरकार के दावों और अर्थशास्त्रियों की आपत्तियों के बीच बहस जारी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तेज GDP वृद्धि का असर रोजगार, निवेश, आमदनी और आम नागरिकों की आर्थिक स्थिति पर कितना दिखाई देता है।










