मुंबई। वर्ष 1980 में इलाहाबाद से एक युवा अभिनेता बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे अयूब खान के लिए मायानगरी का सफर आसान नहीं था। स्टूडियो के बाहर लंबी कतारें, सीमित आर्थिक संसाधन और परिवार की बढ़ती चिंता के बावजूद उन्होंने मुंबई छोड़ने का फैसला नहीं किया। यही जिद आगे चलकर उनके चार दशक लंबे सिनेमाई सफर की पहचान बनी।
अयूब खान ने वर्ष 1981 में फिल्म एग्जीबिटर के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। नसीब, सिलसिला, निकाह और क्रांति जैसी फिल्मों के प्रदर्शन से जुड़े रहते हुए उन्होंने सिनेमाघरों और दर्शकों की पसंद को करीब से समझा। इसके बाद उन्होंने फिल्म वितरण के क्षेत्र में कदम रखा और त्रिवेणी जैसी फिल्मों के जरिए भारत से लेकर विदेशों तक अपना नेटवर्क विकसित किया।
उनके करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव उस समय आया, जब उन्हें मशहूर फिल्मकार गुलज़ार के साथ काम करने का अवसर मिला। मिर्ज़ा ग़ालिब सीरीज़ और फिल्म लिबास में असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में काम करते हुए उन्होंने कहानी, निर्देशन और फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखीं। आगे चलकर अपराधिनी, अंधा इंतकाम, ज़मीर की आवाज़ और अग्नि मोर्चा जैसी फिल्मों में चीफ असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में भी काम किया।
टेलीविजन के क्षेत्र में भी अयूब खान सक्रिय रहे। ज़ी टीवी के बनेगी अपनी बात और दूरदर्शन के किस्सा शांति का जैसे धारावाहिकों से जुड़कर उन्होंने छोटे पर्दे की कहानी कहने की शैली को समझा।
लेखक और एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर के रूप में उन्होंने बे-लगाम – द लॉलेस, जहां तुम ले चलो और अनजाने – द अननोन जैसी फिल्मों पर काम किया। वहीं क्रिएटिव डायरेक्टर और वर्ल्डवाइड डिस्ट्रीब्यूटर के तौर पर मर्डर माधुरी और मूसा – द मोस्ट वांटेड से जुड़े। अरबाज़ खान और जिमी शेरगिल अभिनीत ये तो टू मच हो गया में भी उनकी भूमिका रही।
इसके बाद अयूब खान ने निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा। उन्होंने शॉर्ट फिल्म फैमिली फर्स्ट लिखी और निर्देशित की, जिसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में 28 पुरस्कार मिले। इस सफलता के बाद उन्होंने फिल्म फेस्टिवल के क्षेत्र को भी अपने सफर का हिस्सा बनाया।
आज अयूब खान मुंबई और कोलकाता में सिनेड्रीम्स इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल तथा लखनऊ इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के संस्थापक हैं। इन मंचों के जरिए नए फिल्मकारों, कलाकारों और तकनीशियनों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलता है। उनके लिए फिल्म फेस्टिवल केवल पुरस्कारों का मंच नहीं, बल्कि नई सिनेमाई प्रतिभाओं और कहानियों की तलाश का माध्यम है।
फिलहाल अयूब खान अपनी आगामी हिंदी फीचर फिल्म “शुभ संगम” पर काम कर रहे हैं। फिल्म का निर्देशन पराग छापेकर और लेखन कमलेश पांडे कर रहे हैं, जबकि कहानी अयूब खान की है। प्रयागराज, लखनऊ और उत्तर प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में प्रस्तावित शूटिंग के जरिए वे प्रदेश की नई प्रतिभाओं को भी अवसर देने की दिशा में काम कर रहे हैं।
इलाहाबाद से मुंबई पहुंचे उस युवा सपने देखने वाले लड़के का सफर आज प्रदर्शक, वितरक, लेखक, निर्देशक और फिल्म फेस्टिवल आयोजक तक पहुंच चुका है। करीब 46 वर्षों से सिनेमा से जुड़े अयूब खान आज भी उसी ऊर्जा और जुनून के साथ सक्रिय हैं। उनका सफर इस बात की मिसाल है कि सपने कभी खत्म नहीं होते—कभी-कभी वे सिर्फ अपना रास्ता बदल लेते हैं।
रिपोर्ट : जावेद अहमद











