आज अवान के जीवन का एक बहुत बड़ा दिन है, जब उसने अपना पहला रोजा रखा है! सिर्फ 7 साल के अवान ने इस बड़े कदम के लिए खुद को तैयार किया है, और यह सचमुच गर्व की बात है। उसके नाना शरीफुद्दीन जी के लिए यह दिन और भी खास है, क्योंकि वे अपने नाती की इस उपलब्धि को बहुत करीब से देख रहे हैं।
अवान के माता-पिता ने बताया कि उसने खुद ही रोजा रखने का फैसला किया था। “पापा, मैं रोजा रखना चाहता हूँ,” उसने कहा था। उसकी आँखों में एक चमक थी, और परिवार के सभी लोग उसकी इस बात से खुश हो गए।
शरीफुद्दीन जी ने अवान को आकर दुआ दी और कहा, “बेटा, तुम्हारे लिए यही दुआ है कि तुम हर साल रोजे रखो और अल्लाह तुम्हारी हर मन्नत पूरी करे।” अवान ने मुस्कुराते हुए अपने नाना का आभार जताया।
रोजा रखने का मतलब सिर्फ खाना-पीना छोड़ना नहीं है, बल्कि यह आत्म-संयम और सहानुभूति सीखने का भी एक तरीका है। अवान ने अपने पहले रोजे में इसे महसूस किया होगा। उसने दिनभर स्कूल में अपने दोस्तों के साथ बिताया, और जब शाम को इफ्तार का समय हुआ, तो उसने अपने परिवार के साथ मिलकर रोजा खोला।
अवान के इस कदम से उसके परिवार में खुशी का माहौल है। उसके दादा-दादी, नाना-नानी और सभी लोग उसे बधाई दे रहे हैं। यह दिन अवान के लिए एक यादगार दिन बन गया है, और आगे भी वह इसी तरह अपने धार्मिक कर्तव्यों को निभाता रहेगा, ऐसी उम्मीद है।
अवान की कहानी
अवान ने बताया, “मैंने रोज़ा रखा, मुझे भूख लगी थी, लेकिन मैंने पानी नहीं पिया।”
अवान के पापा ने कहा
अवान के पापा ने कहा, “हम अपने बच्चे पर गर्व करते हैं। अवान ने हमें दिखाया है कि छोटे बच्चे भी बड़े काम कर सकते हैं।”
अवान को उसके पहले रोजे की बहुत-बहुत बधाई! 🌟






