नई दिल्ली/गोरखपुर: देश में मदरसों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। हाल ही में हिमंत बिस्वा सरमा के उस बयान के बाद, जिसमें उन्होंने सैकड़ों मदरसों को बंद करने की बात कही, इस मुद्दे ने राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा को हवा दे दी है। मदरसों को लेकर अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि यहां केवल धार्मिक शिक्षा दी जाती है और यह आधुनिक शिक्षा से दूर हैं।
हालांकि, इतिहास इस धारणा को पूरी तरह खारिज करता है। राजा राम मोहन रॉय, भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रेमचंद और राम मनोहर लोहिया जैसे विद्वानों का संबंध किसी न किसी रूप में मदरसा शिक्षा से रहा है। इसी तरह रामकृष्ण परमहंस, जिन्हें स्वामी विवेकानंद अपना गुरु मानते थे, उन्होंने भी प्रारंभिक शिक्षा में फारसी का अध्ययन किया था।
भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने भी पारंपरिक मदरसा शिक्षा प्राप्त की थी। वहीं गुरु नानक देव से जुड़ी परंपराओं में भी इस तरह की शिक्षा का उल्लेख मिलता है। देश के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और डॉ. राजेंद्र प्रसाद का शुरुआती जीवन भी पारंपरिक शिक्षा से प्रभावित रहा है।
इसी बहस के बीच उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले से एक ऐसा नाम सामने आता है, जो इन धारणाओं को चुनौती देता है—अबुल हसनात क़ासमी।
गोरखपुर के सिकरीगंज क्षेत्र के असाउंजी बाज़ार से ताल्लुक रखने वाले अबुल हसनात क़ासमी ने यह साबित किया है कि शिक्षा का स्वरूप नहीं, बल्कि उसका उपयोग व्यक्ति की पहचान तय करता है। मदरसे से प्राप्त शुरुआती तालीम ने उनके अंदर बौद्धिक मजबूती पैदा की, जिसने आगे चलकर उन्हें एक लेखक, विचारक और समाज विश्लेषक के रूप में स्थापित किया।
उन्होंने दारुल उलूम देवबंद से आलिमियत की डिग्री हासिल की और कुछ समय तक शिक्षण कार्य से जुड़े रहे। लेकिन उनकी असली पहचान उनकी लेखनी से बनी। अपने ब्लॉग darulsaqafah.in के माध्यम से वे सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक विषयों पर बेबाकी से अपनी बात रखते हैं।
उनके लेख केवल जानकारी देने तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे पाठकों के सामने सवाल खड़े करते हैं और विचार-विमर्श को प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी में जहां एक ओर आध्यात्मिक गहराई दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर समकालीन मुद्दों की स्पष्ट और तीखी समझ भी नजर आती है।
भाषाई दक्षता उनकी एक और खासियत है। उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी—तीनों भाषाओं में उनकी पकड़ उन्हें व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाती है। यही कारण है कि उनकी रचनाएं विभिन्न वर्गों के लोगों को प्रभावित करती हैं।
आध्यात्मिकता उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा है। रूहानी इल्म और अमलियात में रुचि उनके लेखन को एक अलग आयाम देती है। उनकी किताबें जैसे “निकाह और इस्लाम”, “अक़साम-ए-सहर और उनका इलाज”, “हलुल मुशकिलात” और “दुआ-ए-मुजर्रब” उनके गहन अध्ययन और अनुभव का प्रमाण हैं।
इसके अलावा उनकी कई नई पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं, जो उनके निरंतर रचनात्मक विकास को दर्शाती हैं।
आज जब मदरसा शिक्षा को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, ऐसे समय में अबुल हसनात क़ासमी जैसे व्यक्तित्व यह साबित करते हैं कि शिक्षा किसी एक ढांचे में सीमित नहीं होती। असली मायने इस बात के हैं कि व्यक्ति उस शिक्षा को किस तरह आत्मसात करता है और समाज के सामने किस रूप में प्रस्तुत करता है।
अबुल हसनात क़ासमी न केवल एक लेखक हैं, बल्कि वे एक ऐसी सोच के प्रतिनिधि हैं, जो अध्यात्म, समाज और समकालीन मुद्दों के बीच संतुलन स्थापित करती है। वे सच मायनों में “अध्यात्म से जुड़े कलम के सिपाही” हैं।











