मुंबई: सोमनाथ के एक साधारण मुस्लिम परिवार में 3 अप्रैल को जन्मी नाज़नीन पाटनी आज फिल्म और डबिंग इंडस्ट्री का प्रतिष्ठित नाम हैं। बचपन में जिनकी दुनिया आइने के सामने सजने-संवरने तक सीमित थी, वही नाज़नीन आज अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज करवा रही हैं। उनकी कहानी सिर्फ सफलता की नहीं, बल्कि बुलंद हौसले और अटूट जिद की कहानी है।
दंगे, पलायन और संघर्षों के बीच बचपन
पिता की नौकरी के कारण नाज़नीन ने गुजरात और महाराष्ट्र के कई जिलों में जीवन बिताया। अहमदाबाद में हुए दंगों के दौरान उनका परिवार जानलेवा हमले का शिकार भी बना, जिसके बाद परिवार नागपुर आकर बस गया। तमाम मुश्किलों के बावजूद नाज़नीन की पढ़ाई जारी रही और आगे चलकर वे पत्रकारिता से जुड़ीं। लेकिन कैमरे से उनका रिश्ता पत्रकारिता से कहीं गहरा था—रिपोर्टर बनने के बाद बहुत जल्द उन्हें समझ आ गया कि उनका असली स्थान कैमरे के सामने है।

मुंबई का पहला संघर्ष
सपनों की नगरी मुंबई पहुंचते ही उन्हें सबसे पहले छल का सामना करना पड़ा। एक ऑटो चालक ने प्रोडक्शन हाउस ले जाने के नाम पर उनसे भारी रकम ऐंठ ली। अनजान शहर में उसे मदद समझने वाली नाज़नीन बाद में जान पाईं कि यह उनका पहला सबक था कि इस उद्योग में भरोसा करना आसान नहीं।
ऑडिशन के दौर शुरू हुए—दरवाज़े बंद मिलते, कभी अपमान तो कभी ठोकरें, मगर नाज़नीन का हौसला नहीं टूटा। उनकी एक्टिंग देखकर लोग अक्सर चौंक जाते कि बगैर ट्रेनिंग के इतनी परिपक्वता उनमें कहां से आई।
बालाजी टेलीफिल्म्स की ठोकर… और वहीँ से मोड़
एक बार एक ऑटो चालक उन्हें बालाजी टेलीफिल्म्स के ऑफिस छोड़ गया, जहां उन्हें बदतमीजी के साथ बाहर निकाल दिया गया। उस दिन एक बुज़ुर्ग वॉचमैन ने उनसे कहा—“बेटी, एक दिन यही लोग तुम्हें काम देंगे।”
वक़्त बदला। कुछ शॉर्ट और इंडी फिल्मों—शीना, माय फादर इक़बाल, अदृश्य और विशेषकर ब्रेस्ट टैक्स—से नाज़नीन को पहचान मिलने लगी। ब्रेस्ट टैक्स ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई पुरस्कार बटोरे।
इन्हीं दिनों आधी रात को बालाजी टेलीफिल्म्स से फोन आया—एक अभिनेत्री ने शूट से ठीक पहले हाथ पीछे खींच लिया था। नाज़नीन को वॉचमैन की बात याद आई। उन्होंने रात में स्क्रिप्ट सुनी और सुबह बिना किसी शिकायत के शूट पर पहुंच गईं। यह प्रोजेक्ट था—“गंदी बात”।
सीरीज सुपरहिट हुई और डूबते दौर से गुजर रहे बालाजी के लिए संजीवनी साबित हुई। नाज़नीन एकता कपूर की “गुड लिस्ट” में आ गईं।

डबिंग की दुनिया की सरताज
नाज़नीन की आवाज़ में वह पकड़ थी कि डबिंग निर्देशक उन्हें एक बार सुनकर ही बुलाने लगे। हिंदी, उर्दू, गुजराती और मराठी के बाद उन्होंने तेलुगु और कोरियन भाषा भी सीख लीं। आज वे डबिंग इंडस्ट्री में सबसे विश्वसनीय और मांग वाली आवाज़ों में शुमार हैं।
अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में लगातार पहचान
“गंदी बात” के बाद उन्हें राम की जन्मभूमि जैसी चर्चित फिल्म मिली। फिर बुक वर्म और चटखारे जैसी फिल्मों ने उन्हें एक बार फिर वैश्विक फिल्म समारोहों में चर्चित किया।
साल 2023 में रिलीज़ हुई नफीसा और द परफेक्ट स्माइल ने नाज़नीन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत पहचान दिलाई।
लंबे इंतज़ार के बाद एकता कपूर ने उन्हें बड़ा मौका दिया—“द साबरमती रिपोर्ट”—जिसने उनके करियर को एक नए मुकाम पर पहुंचा दिया।
आज—सात फिल्मों की कतार में, डबिंग में बुलंदी पर
फिलहाल नाज़नीन केवल चुनिंदा प्रोजेक्ट्स कर रही हैं। उनकी लगभग सात फिल्में रिलीज़ का इंतज़ार कर रही हैं। डबिंग की दुनिया में उनका कद लगातार बढ़ रहा है और वे कई भाषाओं में प्रमुख निर्माताओं की पहली पसंद बन चुकी हैं।
एक मिसाल—जो हिम्मत रखे, वह रास्ता खुद बना लेता है
नाज़नीन पाटनी की यात्रा साबित करती है कि जिद, मेहनत और साहस किसी भी पर्वत को तोड़कर राह बना सकता है। दंगों की स्याह यादों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों की रोशनियों तक का उनका सफर उन सभी सपने देखने वालों को उम्मीद देता है, जो कठिनाइयों से घबराए बिना अपने सपनों को पकड़ कर चलते हैं।











