नई दिल्ली। संसद के भीतर जारी तीखे टकराव के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भारत के अंतरराष्ट्रीय संसदीय रिश्तों को मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल की है। 60 से अधिक देशों के साथ संसदीय मैत्री समूहों का गठन किया गया है, जिनका उद्देश्य भारतीय सांसदों और अन्य देशों के विधायकों के बीच नियमित और प्रत्यक्ष संवाद स्थापित करना है।
किन देशों से संवाद बढ़ेगा?
इन संसदीय मैत्री समूहों के माध्यम से भारत के सांसद श्रीलंका, जर्मनी, न्यूजीलैंड, स्विट्जरलैंड, दक्षिण अफ्रीका, भूटान, सऊदी अरब, इज़राइल, मालदीव, अमेरिका, रूस, यूरोपीय संसद, दक्षिण कोरिया, नेपाल, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जापान, इटली, ओमान, ऑस्ट्रेलिया, ग्रीस, सिंगापुर, ब्राजील, वियतनाम, मेक्सिको, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात समेत कई देशों के सांसदों से संपर्क बढ़ाएंगे। इन समूहों के तहत प्रतिनिधिमंडल समय-समय पर विदेश यात्राएं कर आपसी सहयोग और समझ को मजबूत करेंगे।
सभी दलों के नेताओं को शामिल किया गया
इन समूहों में सत्तापक्ष और विपक्ष—दोनों के प्रमुख नेताओं को जगह दी गई है। इनमें रवि शंकर प्रसाद, पी. चिदंबरम, राम गोपाल यादव, टी.आर. बालू, गौरव गोगोई, कनिमोझी, मनीष तिवारी, डेरेक ओ’ब्रायन, अभिषेक बनर्जी, असदुद्दीन ओवैसी, अखिलेश यादव, के.सी. वेणुगोपाल, सुप्रिया सुले, संजय सिंह, बैजयंत पांडा, शशि थरूर, अनुराग ठाकुर, हेमा मालिनी, बिप्लब देब, सुधांशु त्रिवेदी, सस्मित पात्रा और अन्य कई सांसदों के नाम शामिल हैं।
यह पहल इस बात का संकेत देती है कि संसदीय कूटनीति को दलगत सीमाओं से ऊपर रखकर आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
मौजूदा तनाव के बीच पहल
संसद में इस समय सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद चरम पर हैं। अविश्वास प्रस्ताव, निलंबन और विरोध प्रदर्शनों के कारण कार्यवाही प्रभावित हुई है। ऐसे माहौल में संसदीय मैत्री समूहों का गठन एक सकारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर साझा भागीदारी से घरेलू राजनीतिक संवाद को भी सहज बनाने में मदद मिल सकती है।
पिछले वर्ष भी विशेष परिस्थितियों में सांसदों के प्रतिनिधिमंडल विदेश भेजे गए थे, जिसे व्यापक स्तर पर सराहा गया था। हालांकि कुछ बयानों को लेकर राजनीतिक विवाद भी सामने आया था।
अब बजट सत्र के आगामी चरण से पहले इस नई पहल को संसद में सहयोग और संवाद की दिशा में एक प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है। उम्मीद की जा रही है कि इससे सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच दूरी कम होगी और संसदीय कामकाज अधिक सुचारू रूप से चल सकेगा।








